अपनी आदत को बदलें – भाग-2
Neuroplasticity के रहस्य को समझते हुए आइये आदत, सोच और कर्म को गुर्जिएफ़, जेन-कोआन और बौद्ध बोधिचित्ता के दृष्टिकोण से बदलें |
आइये पहले जाने आधुनिक तंत्रिका विज्ञान की नवीनतम खोज Neuroplasticity क्या है यानि मस्तिष्क कैसे सीखता है
जब भी आप कोई विचार, भावना या शारीरिक क्रिया का अनुभव करते हैं, तो आपके मस्तिष्क में विशिष्ट न्यूरॉन्स सक्रिय हो जाते हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं। यदि आप किसी अनुभव को दोहराते हैं जैसे चलना, भागना, खेल खेलना आदि तो इस से सम्बन्धित न्यूरॉन्स बार-बार एक साथ सक्रिय होते हैं। मस्तिष्क चाहता है कि आप बार-बार जो कार्य कर रहे हैं उस पर ज्यादा उर्जा न लगे इसीलिए वह उसके लिए एक स्थिर मार्ग बना देता है जहाँ एक से न्यूरॉन जुड़ कर काम करने लगते हैं | यह प्रक्रिया बताती है कि आदतें कैसे बनती हैं। मस्तिष्क “अच्छे” या “बुरे” पैटर्न में अंतर नहीं करता है। यदि आप लगातार तनाव पर चिंता या चिंतन के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, तो आप सक्रिय रूप से उन मार्गों को मजबूत करते हैं, जिससे वे भविष्य में आपकी स्वचालित प्रतिक्रिया बन जाती है |
इसे ही न्यूरोप्लास्टिसिटी कहते हैं जोकि आज के आधुनिक ब्रेन साइंस की सबसे क्रांतिकारी खोज है। इस खोज के अनुसार “जो न्यूरॉन्स एक साथ फ़ायर करते हैं, वे आपस में जुड़ जाते हैं”। दूसरे शब्दों में, जो न्यूरॉन्स एक ही समय में एक्टिव होते हैं, वे आपस में कनेक्शन बना लेते हैं; वे जितनी बार जुड़ते हैं, वह कनेक्शन उतना ही मज़बूत होता जाता है।
पिछले भाग की कहानी में राकेश के दिमाग में क्या चल रहा था? वह पिछले दो साल से, रोज़ शाम को जब ऑफिस से थक कर लौटता था तब सोफे पर बैठते ही उसका हाथ स्वमेव ही फ़ोन उठा कर स्क्रोल करने लगता था। हर बार एक न्यूरॉन pattern activate होता है — थकान → phone, इस pattern को मस्तिष्क और मज़बूत करता जा रहा है। दो साल बाद यही साधारण सी आदत उसके दिमाग में मजबूत हो एक highway बन चुकी है।
तंत्रिका विज्ञान यानि Neuro Science के अनुसार “neurons that fire together, wire together” का उल्टा भी सच है कि “neurons that don’t fire together, lose their wire”, यानी जिस पैटर्न को आप प्रयोग नहीं करते है तो उसके कनेक्शन कमज़ोर होते जाते हैं।
अच्छी खबर यह है कि मस्तिष्क स्थिर नहीं है; यह सिद्धांत अनुभव-आधारित न्यूरोप्लास्टिसिटी पर आधारित है । जिस प्रकार दोहराव से संबंध मजबूत होते हैं, उसी प्रकार निष्क्रियता या नए संबंध बनने से वे कमजोर भी हो सकते हैं। नए विचारों, प्रतिक्रियाओं और व्यवहारों को जानबूझकर चुनकर, आप शारीरिक रूप से नए तंत्रिका मार्ग बना सकते हैं, जबकि पुराने, अवांछित मार्गों को समय के साथ कमजोर होने दे सकते हैं।
यहाँ यह बात स्पष्ट हो जाती है कि राकेश का दिमाग़ यानि आदत को बदला जा सकता है। लेकिन यह सिर्फ “willpower” से सम्भव नहीं है।
तो क्या करें? यहीं तीन परंपराएँ काम आती हैं — हर एक-एक अलग स्तर पर।
पहला स्तर — आदत (Habit) | Gurdjieff का Self-Remembering
बीसवीं सदी के एक रहस्यवादी शिक्षक जोर्ज गुरुजिएफ़ ने एक गहरी बात कही थी कि “मनुष्य अपनी 95% ज़िंदगी सोते हुए बिताता है”। उनका मतलब बिस्तर की नींद नहीं था बल्कि उनके कहने का तात्पर्य था कि बहुत से काम हम automatically या मशीनी रूप से करते हैं यानि बिना सोचे-समझे करते हैं। राकेश मेट्रो स्टेशन पर खड़ा था और बिना सोचे समझे उसके हाथ ने फ़ोन जेब से निकाला और फिर उसने बिना सोचे-समझे स्क्रोल करना शुरू कर दिया |
Gurdjieff का समाधान था — Self-Remembering यानि जब भी ऐसा हो या हो रहा हो तो उस समय एक छोटा सा अंदरूनी प्रश्न, “मैं अभी क्या कर रहा हूँ”, “मैं अभी कहाँ हूँ”, “क्या मैं जागरूक हूँ या automatic mode में हूँ”?
आइये जानें कि पिछले भाग में दी गई कहानी में राकेश इसे कैसे व्यवहारिक रूप से प्रयोग कर सकता है |
फ़ोन उठाते समय वह पांच सेकंड के लिए रुक कर स्वयम से पूछे कि मैं अभी फ़ोन क्यों उठा रहा हूँ? क्या मुझे कुछ चेक करना है या मैं बस ऑटोपायलट पर हूँ?
उसका यह पांच सेकंड का रुकना एक नया न्यूरल पाथवे बनाना शुरू कर देगा। यह पहली बार नहीं होगा, न ही दूसरी या तीसरी बार में होगा लेकिन पचासवीं बार में कुछ बदल जाएगा। और इसे ही गुरजिएफ ने खुद पर काम करना कहा था और इसे ही आज का आधुनिक तंत्रिका विज्ञान आदत में रुकावट कहता है।
लेकिन यह सिर्फ़ पहला पड़ाव है। अगर राकेश सिर्फ़ खुद को याद रखने की प्रैक्टिस करता है तो उसका माइंडसेट नहीं बदलेगा। उसके मन में वही ख्याल आता रहेगा कि “बस एक और वीडियो।”
दूसरा स्तर — सोच (Thought) | Zen का Koan
ज़ेन कोआन (Zen Koan) ज़ेन बौद्ध धर्म में उपयोग की जाने वाली विरोधाभासी और तर्कहीन पहेलियाँ या कथन होते हैं इन्हें तार्किक दिमाग को उलझाने या सुलझाने के बजाय, सामान्य सोच की सीमाओं को पार कर गहरी आध्यात्मिक जागरूकता और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है | इसका उद्देश्य है तार्किक विश्लेषण को रोककर और ‘मुझे नहीं पता’ वाली अवस्था (Don’t Know Mind) को जाग्रत करके सत्य का अनुभव करने में मदद करना है | इन्हें हल नहीं किया जा सकता, बल्कि ध्यान (Zazen) के दौरान इन पर चिंतन किया जाता है ताकि मन को सभी पूर्वाग्रहों से खाली किया जा सके |
तंत्रिका विज्ञान के अनुसार राकेश का दिमाग़ फ़ोन स्क्रोलिंग के समय एक ही तरह के पैटर्न पर चलता है, “बस एक और, बस एक और”, जोकि automatic mode है यानि बिना सोच-समझ के बस चलते ही जाना | कोआन इसी automatic pattern को हिलाता है | जब आप बेवजह के प्रश्न पूछते हैं तो वह स्वचालित पैटर्न उलझन में पड़ जाता है और ऐसे समय में नया न्यूरॉन रास्ता बनाया जा सकता है | आइये इसे राकेश की कहानी के माध्यम से जाने |
राकेश को जब भी फ़ोन स्क्रोलिंग की इच्छा हो तो उस समय यदि वह कोआन तरीके से अपने आप से प्रश्न पूछे कि”यह ‘बस एक और’ कौन कह रहा है? क्या वह ‘मैं’ हूँ या एक pattern?”
पहली बार में जवाब नहीं मिलेगा। बस एक अजीब-सी उलझन या confusion होगी लेकिन वह उलझन या confusion ही जरूरी है। क्योंकि उस क्षण में पुरानी सोच का पैटर्न तोडा जा सकता है और एक नया पैटर्न बनाया जा सकता है। लेकिन सिर्फ कोआन अकेला ही काफी नहीं है | क्योंकि सोच बदलने पर भी, कर्म-इच्छा पुरानी रहती है। “मुझे रात को अकेलापन चाहिए इसलिए फ़ोन चाहिए।” इस मूल प्रेरणा को कैसे बदलें?
यहीं तीसरी परंपरा आती है।
तीसरा स्तर — कर्म-इच्छा (Intention) | बौद्ध – बोधिचित्ता |
बोधि यानी जागृति। चित्त यानी मन। बोधिचित्त यानी जागृत-मन। लेकिन इसका असली अर्थ है सब प्राणियों के कल्याण की प्रबल इच्छा।
आइये महायान बोद्धधर्म, न्यूरोप्लास्टिसिटी और राकेश की कहानी से कैसे जुड़ा है?
राकेश की फ़ोन स्क्रॉलिंग के मूल में सिर्फ आदत नहीं है बल्कि इस आदत के भीतर छुपा है “मुझे थकान है, मुझे एक ब्रेक चाहिए। बोधिचित्ता इस सोच को बदल सकती है। राकेश अगर रोज़ सुबह एक मिन्ट के लिए सोचे कि आज मैं अपने फ़ोन टाइम को कम करूँगा लेकिन अपने लिए नहीं — साक्षी के लिए। मीनू के लिए। अंश के लिए। ताकि उन्हें एक अच्छा पति और पिता मिल सके।”
ये एक छोटा सा शब्दों का बदलाव लगता है लेकिन यह सोच मस्तिष्क में बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है। तंत्रिका विज्ञान के अनुसार जैसे ही कोई व्यक्ति “खुद पर केंद्रित” इरादे से हटकर “दूसरों पर केंद्रित” इरादे की ओर बढ़ता है तो उसकी प्रेरणा का न्यूरोलॉजिकल आधार भी बदल जाता है।
तीनों एक साथ — असली समीकरण
अमित ने राकेश से कहा था कि यह केवल एक आदत नहीं है बल्कि यह आदत तीन स्तर पर फैली हुई है इसलिए ही केवल will power काम नहीं आएगी बल्कि तीन तकनीक के माध्यम से एक साथ काम करना होगा तभी यह ठीक होगी | आइये जाने कैसे :
पहला स्तर: आदत (Habit) → गुरुजिएफ़ की Self-Remembering तकनीक → हर बार जब फ़ोन की तरफ़ हाथ जाए तो पाँच सेकंड के लिए रुकें और अपने आप से पूछें “मैं अभी क्या कर रहा हूँ” कुछ बदलने की कोशिश मत कीजिए। बस देखिए।
दूसरा स्तर: सोच (Thought) → जेन कोआन तकनीक → जब भी फ़ोन स्क्रोलिंग की इच्छा जागृत हो तो रुकिए और स्वयम से पूछे कि यह बस एक और बार कौन कह रहा है। उत्तर मत खोजिए। बस सवाल को रहने दीजिए।
तीसरा स्तर: कर्म-इच्छा (Intention) → बोधिचित्ता → हर सुबह 2 मिनट के लिए, अपने नज़दीकी लोगों के बारे में सोचिए जो आपकी आदत से प्रभावित हैं। मैं अब उनके लिए यह सब उनके लिए छोडूंगा | बस केवल मन में कहना है |
यह तीनों एक-एक कर शुरू करने के बाद एक साथ तीनो करने पर अवश्य काम करते हैं जोकि आदत छोड़ने में सहायक होंगे। जब आप तीनों को एक साथ करते हैं तो दो हफ़्तों में फ़र्क दिखता है। दो महीनों में आदत बदलती है और छह महीनों में एक नया इंसान।
ये neuroplasticity का असली विज्ञान है, न 21 दिन का कल्पित मिथक, न इच्छा-शक्ति का दर्शन। बल्कि तीन-स्तरीय दृष्टिकोण पर कार्य।
आप में से कोई भी तीन स्तरीय दृष्टिकोण से काम करते हुए पुरानी या नई कोई भी आदत को बदल सकता है :
सप्ताह 1-2: हर बार जब भी आदतानुसार काम करने की इच्छा हो जैसे सिगरेट पीने या शराब पीने या मसाला खाने या कोई ओर भी इच्छा होने पर मस्तिष्क स्वयम काम करता है और वह चीज आपके हाथ में आ जाती है | हाथ में आने तक सब कुछ अपने आप होता है लेकिन हाथ में आने के बाद वह काम शुरू करने से पहले यानि सिगरेट जलाने से पहले या शराब का गिलास होंठ से लगाने से पहले, पाँच सेकंड के लिए रुकें और अपने आप से पूछें “मैं अभी क्या कर रहा हूँ”, कुछ बदलने की कोशिश मत कीजिए। बस देखिए।
सप्ताह 3-4: जब भी उपरोक्त इच्छा जागृत हो तो रुकिए और स्वयम से पूछे कि यह बस एक और बार कौन कह रहा है। उत्तर मत खोजिए। बस सवाल को रहने दीजिए। इसमें सप्ताह 1-2 को पहले की तरह ही चलने दें यानि 3-4 सप्ताह में दोनों एक साथ चलेंगे |
सप्ताह 5 onwards: हर सुबह 2 मिनट के लिए, अपने नज़दीकी लोगों के बारे में सोचिए जो आपकी आदत से प्रभावित हैं। मैं अब उनके लिए यह सब उनके लिए छोडूंगा | बस केवल मन में कहना है |
पाँचवे सप्ताह से ये तीनों एक साथ चलते हैं। ध्यान रखियेगा कि कोई एक छोड़ देंगे तो असर कम होगा। यकीन मानिये आपकी कोई भी आदत बिना कुछ छोड़े ही छूट जायेगी | यह हम नहीं तंत्रिका विज्ञान की आधुनिक खोज कहती है कि दो महीने में आदत बदलती है और छह महीनों में एक नया इंसान।

