अपनी किसी भी आदत को बदलें – भाग- 1
क्या कोई भी किसी भी आदत को कभी भी बदल सकता है?
जी हाँ !
आइये पहले इसे एक कहानी के माध्यम से समझते हैं :
राकेश, पुणे की एक बड़ी कंपनी में सोफ्टवेयर इंजिनियर के पद पर पिछले तीन साल से अच्छी-खासी तनख्वाह पर काम कर रहा है | राकेश की पत्नी मीनू एक प्राइवेट स्कूल में टीचर है | बेटी साक्षी छठी कक्षा में और बेटा अंश दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है | घर में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है इसके बावजूद दोनों पति-पत्नी ऑफिस के stress की वजह से घर आने पर भी परेशान रहते हैं |
रोज़ शाम को राकेश जब भी ऑफ़िस से लौटता है तो थका-टूटा सा चेहरा लिए घर में घुसता है। घर लौटकर वो सिर्फ़ एक चीज़ चाहता है कि एक कप गर्म चाय और कुछ देर का सुकून और उसके सुकून का रास्ता मोबाइल पर fb या insta या YT पर विडियो देखना या अनजान लोगों से chat करना है।
करीब-करीब हर रोज रात 8:30 बजे डिनर और 9:30 बजे बच्चों के सोने का समय लगभग निश्चित है। एक रात 9:00 बजे के करीब बड़ी बेटी साक्षी राकेश के पास आकर बोली कि पापा math का एक question समझा दो। राकेश सोफ़े पर लेटा हुआ phone पर reel देख रहा था | उसने फ़ोन देखते हुए ही जवाब दिया “बस पाँच मिनट, बेटा। मैं phone रखकर आता हूँ”। बेटी इन्तेजार करते-करते सो जाती है लेकिन राकेश के पांच मिन्ट नहीं होते | अचानक रात ग्यारह बजे राकेश को साक्षी की बात जब याद आती है तो वह उसके कमरे में जाता है | उसे बहुत दुःख होता है कि उसकी बेवकूफी की वजह से साक्षी का होमवर्क अधूरा रह गया है।
यह किस्सा एक या दो दिन का नहीं है | पिछले दो साल से राकेश की इस आदत से सारा घर परेशान है | ऐसा भी नहीं है कि राकेश को यह आदत अच्छी लगती है लेकिन वह चाह कर भी इस आदत को छोड़ नहीं पा रहा है |
अगले दिन — Day 1। राकेश और मीनू की आपस में काफी कहा-सुनी होने के बाद राकेश ने कसम खाई कि अब वह घर आने पर फ़ोन को हाथ तक नहीं लगाएगा और ऐसा उसने किया भी | ऑफ़िस में भी सिर्फ़ ज़रूरी कॉल ही करने के लिए फ़ोन का इस्तेमाल किया। शाम बच्चों और मीनू के साथ बिताई |
Day 2 — थोड़ा कण्ट्रोल छूटा लेकिन फिर भी कसम का पालन किया लेकिन उसे रात को नींद नहीं आई। अजीब-सी बेचैनी रही।
Day 3 — बॉस ने एक मीटिंग में उसे इसी आदत के कारण डाँटा इसके बावजूद मेट्रो स्टेशन पर मेट्रो का इन्तेजार करते हुए कब उसका हाथ फ़ोन पर गया और कब उसने फ़ोन उठा reel देखनी शुरू कर दी, उसे पता ही नहीं लगा।
Day 5 — पहले से भी ज़्यादा scrolling। मीनू ने देखा। कुछ बोली नहीं।
Day 7 — कसम टूट चुकी थी।
राकेश के काफी कोशिश के बावजूद एक छोटी-सी आदत ने उसे एक बार फिर से जकड़ लिया | राकेश ने willpower यानि इच्छा-शक्ति या आत्म-बल का प्रयोग किया लेकिन हर बार हार का ही सामना करना पड़ा | उसने एक “app blocker” का प्रयोग किया लेकिन कुछ समय बाद उसे भी डिलीट कर दिया | उसने “30-day digital detox challenge” की कसम खाई। चौथे दिन तोड़ दी। उसने एक self-help किताब पढ़नी शुरू की, दो chapter पढ़कर छोड़ दिया।
अपने आप से परेशान हो, एक रविवार वह अपने कॉलेज के दोस्त, अमित से मिलने उसके घर जा पहुँचा | अमित पिछले दस साल से ध्यान कर रहा था। राकेश ने उसे अपनी पूरी कहानी सुनाई, आदत, टूटी कसमें, साक्षी का होमवर्क, मीनू की नाराज़गी, अधूरी रातें।
अमित ने राकेश की बात ध्यान से सुनी। फिर एक बात कही जो राकेश ने आज तक किसी से नहीं सुनी थी। अमित बोला “भाई, तू अपनी आदत से क्यों लड़ रहा है | अकेले इस आदत से लड़ेगा तो कभी जीत नहीं पायेगा” | अमित की बात सुन राकेश परेशान हो बोला “भाई, मैं तेरे पास इसीलिए आया था और तू कह रहा है कि मैं छोड़ ही नहीं पाऊंगा तो फिर…” | अमित मुस्कुराते हुए बीच में ही बोल उठा “भाई मेरे कहने का मतलब ये था कि तू यदि इस आदत को एक मान कर छोड़ने की कोशिश करेगा तो नहीं कर पायेगा क्योंकि ये एक नहीं, दो नहीं, तीन हैं”। यह बात सुन, राकेश चौकते हुए बोला “भाई मेरी एक यही आदत है और कोई नहीं है”?
अमित हँसते हुए बोला “तूने एक्सप्रेस हाईवे तो देखा ही होगा और शायद उस पर गया भी होगा | उस पर गाड़ी कण्ट्रोल करनी पड़ती है क्योंकि रोड इतनी अच्छी होती है कि स्पीड कब बढ़ जाती है पता ही नहीं लगता है | भाई जब कोई भी काम करते-करते आदत में परिवर्तित हो जाता है तो वह काम हाईवे पर बेलगाम गाड़ी की तरह भागने लगता है और हम सोचते है कि वह एक गाड़ी है जबकि उसके साथ ही साथ दो और गाड़ियाँ भी चल रही होती हैं जो हमें दिखती ही नहीं हैं” |
राकेश परेशान हो बोला “भाई इतनी कहानी क्यों सुना रहा है | सीधी बात कर ना यार” | अमित मुस्कुराते हुए बोला “भाई, आदत एक गंभीर बात है इसीलिए इसे अच्छी तरह से जब तक नहीं समझेगा तब तक उसकी जड़ तक नहीं पहुँच पायेगा और जब तक जड़ तक नहीं पहुंचेगा तब तक उसे ठीक नहीं कर पायेगा” | खैर, भाई आदत के साथ दो और साथी भी होते हैं, इच्छा-शक्ति और सोच | तेरी प्रॉब्लम सिर्फ़ आदत की नहीं है बल्कि इन तीनों स्तरों की है। और इन तीनों के लिए जब तक अलग-अलग काम नहीं करेगा, कसमें टूटती रहेंगी और तू यूँ ही जूझता रहेगा”, कह कर जैसे ही अमित चुप करता है तो राकेश तेज स्वर में बोल उठता है, “इसका मतलब की तीनों के लिए अलग-अलग तरीके और तकनीक से काम करना होगा”?
अमित मुस्कुराया और बोला “दोस्त, तुम्हें पहले आदत को neuroscience के माध्यम से समझना होगा जब तुम इसे समझोगे तो फिर उसे तीन परम्पराओं के माध्यम से ठीक करना होगा जो इसी पर काम करती हैं | यदि सही तरीके से किया तो परिणाम अवश्य आएगा | वह तीन परंपरा हैं, Gurdjieff का self-remembering, Zen का koan और बौद्ध Bodhicitta। तीनों एक साथ। यही असली neuroplasticity है”।
दोस्तों, आज के समय में राकेश अकेला नहीं जो अपनी आदत से परेशान है। मोबाइल की आदत आज के समय में बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है | ऐसी और बहुत सी आदते हैं जो हर दूसरे या तीसरे इंसान से जुड़ी हुई हैं | आप मोबाइल की जगह कोई और आदत भी रख कर देख सकते हैं | आपको इंसान की झूझन एक सी दिखेगी, वह आदत शराब या सिगरेट या अन्य नशे की हो या फिर क्लेश करने या नेगेटिव सोच की हो या फिर हर किसी में गलती ढूंडने की हो या फिर झूठ बोलने की हो | ऐसी हजारों आदते हैं जो आज के समय में परेशान कर रही हैं |
यह कहानी हर उस आदमी पर लागू होती है जो अपनी आदत से परेशान है और उपाय जो हम अगले भाग में बताएँगे वह भी हर आदत को ठीक करने पर लागू होता है | यदि आपने तकनीक का सही तरीके से प्रयोग किया तो परिणाम भी मिलेगा और कोई भी किसी भी तरह की आदत कभी भी छोड़ सकता है |
अगले भाग में :-
Neuroplasticity का असली रहस्य | आदत, सोच और कर्म को कैसे बदलें और वह भी Gurdjieff, Zen Koan और बौद्ध Bodhicitta की रोशनी में आधुनिक brain science.

