ध्यानावस्था और विधि भाग-2

ध्यान एक अवस्था है, क्रिया नहीं। यह पहली और सबसे महत्वपूर्ण समझ है। आप ध्यान नहीं कर सकते। ध्यान आपके साथ हो सकता है। ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। जैसे आप नींद नहीं ला सकते, आप बस परिस्थितियाँ बना सकते हैं जैसे बत्ती बंद कीजिए, बिस्तर पर लेटिए, आँखें बंद कीजिए, शरीर ढीला कीजिए। ये सब कर के नींद आएगी या नहीं कोई नहीं कह सकता। ध्यान भी बिल्कुल वैसा है। आप परिस्थितियाँ बना सकते हैं, एक शांत जगह, एक स्थिर शरीर, साँस की एक लय-ताल, मन का खाली होना आदि। ध्यान घटित होगा या नहीं यह कोई नहीं कह सकता।

आप में से 99% लोग जो “ध्यान कर रहे हैं”, वो परिस्थितियाँ बना रहे हैं और सोच रहे हैं कि वही ध्यान है। जबकि ध्यान में ध्यान कर्ता की मृत्यु हो जाती है, चोंकिये नहीं, हमारे कहने का मतलब है कि कर्ता और कर्म एक हो जाते हैं। कहने का अर्थ है कि हर क्रिया के साथ एक कर्ता होता है। जब आप साँस लेते हैं तो आप साँस ले रहे हैं। जब आप मंत्र बोलते हैं तो आप बोल रहे हैं। जब आप concentrate करते हैं तो आप कर रहे हैं। यह “आप” हर पल मौजूद रहता है। ध्यान वह क्षण है जब यह “आप” यानि कर्ता, एक पल के लिए गायब हो जाता है। न कोई करने वाला बचता है और न कुछ किया जा रहा, वह बचता है। बस होना रह जाता है। शुद्ध अस्तित्व, बिना किसी viewer के। और यह जब होता है तो आप को पता नहीं चलता कि हुआ। क्योंकि आप तो वहाँ थे ही नहीं। पता बाद में चलता है, जब आप वापस आते हैं, और एक अजीब-सी ताज़गी, एक अजीब-सी शांति, कहीं से उठ रही होती है। आपने उसे बनाया नहीं। वो पहले से आपके साथ थी लेकिन आप उसे अभी तक महसूस नहीं कर पाते थे।

ध्यान वह नहीं जो आप करते हैं, ध्यान वह है जो आप हैं।

यह तीसरी और सबसे क्रांतिकारी समझ है।

आप पहले से ही ध्यान हैं। जब आप किसी फूल को बिना किसी विचार के देखते हैं बस एक क्षण के लिए तो वो ध्यान है। जब आप संगीत में डूब जाते हैं और भूल जाते हैं कि मैं सुन रहा हूँ, वो ध्यान है। जब प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे की आँखों में देखते हैं और शब्द ख़त्म हो जाते हैं तो वो ध्यान है।

समस्या ये नहीं कि ध्यान आपको करना है। समस्या ये है कि आप ध्यान को खो चुके हैं। और इसका कारण है आपका मन। आपका लगातार सोचना। आपकी हर पल मैं” की पहचान। ध्यान कुछ पाना नहीं है। ध्यान उस तक लौटना है जो आप पहले से हैं लेकिन आप भूल चुके हैं।

आज का ध्यान-बाज़ार गलत प्रचार-प्रसार कर रहा है कि ध्यान सीखा जा सकता है”। ध्यान सीखा नहीं जा सकता। Concentration सीखी जा सकती है। Relaxation techniques सीखी जा सकती हैं। Breathing exercises सीखी जा सकती हैं। पर ध्यान वह जो स्वयं होता है , उसे कौन सिखाएगा और कौन सीखेगा?

जब Meditation app आपसे कहता है “You meditated for 20 minutes today” , तो वो technically सच नहीं बोल रहा है। उसे कहना चाहिए “You completed a 20-minute relaxation session today” , लेकिन वो meditation शब्द बेच रहा है क्योंकि meditation का ब्रांड-वैल्यू है, relaxation का नहीं।

यही करोड़ों डॉलर का व्यापार है और इस व्यापार में करोड़ों लोग सोच रहे हैं कि वो आध्यात्मिक यात्रा पर हैं जबकि वे केवल premium relaxation का उपभोग कर रहे हैं।

हम गलत कह रहे हैं या ठीक इसे आप अभी खुद जांच या check कर सकते हैं।

अपनी meditation app खोलें लेकिन हेडफ़ोन मत लगाइए या guided voice मत सुनिए या sounds मत बजाइए। बस बत्ती बंद कीजिए, बैठिए, और बीस मिनट कुछ नहीं कीजिए। न कोई technique। न कोई instruction। न कोई music। अगर आपको असुविधा हो या मन घबराए या बीस मिनट बहुत लम्बे लगें तो आपको अपना उत्तर मिल गया। आपको ध्यान की लत नहीं है। आपको उस app की लत है। और app ने आपको कभी ध्यान नहीं सिखाया | उसने सिर्फ़ आपकी बेचैनी को मीठा packaging दिया है।

आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठ रहा होगा कि फिर आखिर ध्यान में या ध्यान के लिए क्या किया जाता है?

पहला कदम — ये जान लीजिए कि आप ध्यान करना नहीं सीख सकते। यह एक revolutionary realization है और जिस दिन आप इसे सच में जान लेते हैं उस दिन आपकी ध्यान की आधी यात्रा पूरी हो जाती है।

दूसरा कदम — रोज़, बीस मिनट, कुछ नहीं कीजिए। यह सबसे कठिन अ-क्रिया या अकर्म है। बैठिए। साँस लेते रहिए जैसे ले रहे हैं। मन को आने-जाने दीजिए। उसे रोकिए मत, उससे लड़िए मत, उसे प्रोत्साहित या हतोत्साहित मत कीजिए। बस उसे होने दीजिए।

तीसरा कदम — कोई अनुभव की उम्मीद मत रखिए। अगर “कुछ” हुआ, तो वो ध्यान नहीं था, कोई और चीज़ थी। ध्यान में कुछ नहीं होता। क्योंकि “होने वाला” और “देखने वाला”, दोनों गायब हो जाते हैं। जब आप वापस आते हैं तब आप शायद कह सकें “मैं वहाँ था ही नहीं” और यदि ऐसा कह सकें तो ध्यान घटित हुआ।

चौथा कदम — इसे करते रहिए, बिना समय या मात्रा देखे। ध्यान दिनों में नहीं फलता। ध्यान दिनों को पार करने के लिए है। जो “21-day meditation challenge”, करता है वो ध्यान नहीं कर रहा है। ध्यान कोई challenge नहीं बल्कि एक जीवनशैली है।

आइये, इस बात को तीन अलग-अलग परंपराओं के दृष्टिकोण से देखते हैं :

पतंजलि योगसूत्र में ध्यान को इस तरह परिभाषित किया गया है “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” यानि योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है यानि मन की हलचल का रुक जाना। अर्थात यह क्रिया नहीं बल्कि एक अवस्था है।

बौद्ध परंपरा में ध्यान को झान (Pali) या ध्यान (Sanskrit) कहा गया है। बुद्ध ने इसे अष्टांगिक मार्ग का सातवाँ अंग बताया है “सम्यक समाधि”, यानि वह कहना चाह रहे हैं कि झान कोई practice नहीं बल्कि सही practice का परिणाम है।

अद्वैत वेदांत में कहा गया है कि न योग से, न सांख्य से, न कर्म से, न विद्या से — सिर्फ़ ब्रह्म-आत्म की एकता के बोध से मुक्ति मिलती है।

तीनों एक ही बात कह रहे हैं कि ध्यान कुछ करने का नाम नहीं है बल्कि ध्यान कुछ जानने का नाम है। अर्थात जिस “कुछ” को आप ढूंड रहे हैं वह आप पहले से ही हैं।

एक चेतावनी, एक आश्वासन

चेतावनी — यह सुनकर बहुत लोग सोचेंगे कि फिर मैं कुछ करूँ ही ना, बस बैठ जाऊँ”,  नहीं। यह आलस्य नहीं। यह सक्रिय अ-क्रिया है। बैठना भी अनुशासन माँगता है। बीस मिनट बिना कुछ किए बैठना ही आज के युग की सबसे कठिन तपस्या है। इसे करिए। पर इसे तकनीक मत बनाइए।

आश्वासन — यदि आप यह कर सकें तो रोज़, बस बैठना है और वो भी बिना किसी उम्मीद  के | एक दिन, अनायास, अचानक कुछ होगा। न पता चलेगा कब। न पता चलेगा क्यों। बस एक क्षण आएगा जब आपको यह बोध होगा कि देखने वाला और दृश्य अलग नहीं हैं और उस क्षण के बाद, आप वही नहीं रहेंगे।

बस यही ध्यान है। कुछ और नहीं।

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