क्या ध्यानावस्था विधि द्वारा प्राप्त की जा सकती है? भाग-1

ध्यानावस्था —सचमुच त्राटक, एकाग्रता, तनाव प्रबंधन, लयबद्ध श्वास या किसी अन्य विधि के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है?

राहुल की उम्र लगभग चालीस साल है | वह एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर की पोस्ट पर पिछले कुछ साल से कार्य कर रहा है। शुरू-शुरू में उसे अपने दोस्तों की बात झूठ लगी कि यह पोस्ट आदमी का खून निचोड़ लेती है लेकिन कुछ समय बाद ही उसकी राय बदल गई | वह शुरू से इस तरह का इंसान रहा है कि हर समस्या का हल खोज कर ही दम लेता है और उसने इस स्ट्रेस का भी हल निकाल कर ही दम लिया | पिछले तीन साल से वह हर रोज़ बीस मिनट के लिए मैडिटेशन की एक बहुत पोपुलर app के माध्यम से ध्यान कर रहा है। हेडफ़ोन लगा  आँखें बंद कर समुद्र की आवाज़ें सुनते हुए उसने अभी तक लगभग 1,127 दिन मैडिटेशन का कोर्स कर लिया है। उसे जो भी शान्ति शुरू करते हुए महसूस हुई वह एक साल बाद वैसी नहीं थी और जो एक साल बाद थी वह दो साल बाद नहीं थी और जो तीन साल पहले तक थी वह अब बिलकुल भी नहीं रही | यही कारण है कि वह पिछले कुछ समय से काम के स्ट्रेस के इलावा अपने आप से परेशान रहने लगा था | आखिर परेशान हो उसने एक दिन अपने दोस्त शिवम् के पापा संजीव को फ़ोन कर पूछा कि इतने दिन मैडिटेशन करने के बाद भी मेरे जीवन में कुछ नहीं बदला। ध्यान काम क्यों नहीं कर रहा है?

संजीव, आध्यात्म, तंत्र-मंत्र और ध्यान के अच्छे ज्ञाता थे | उन्होंने हँसते हुए राहुल से पूछा कि आखिर तुम क्या समझते हो कि ध्यान क्या है?

राहुल ने कुछ सोचते हुए जवाब दिया कि ध्यान एक technique है जो stress कम करती है। जिस से मन शांत हो जाता है। फ़ोकस बढ़ता है। ध्यान selfsoothing प्रदान करता है जिस से इंसान रिलैक्स महसूस करता है |

संजीव ने धीरे से कहा कि राहुल बेटा, इसका मतलब तुमने पिछले तीन साल में एक मिनट भी ध्यान नहीं किया है। राहुल चौंक गया और उसका चौंकना गलत भी नहीं था। क्योंकि उसने मैडिटेशन के बारे में यही सुना और जाना था | आज उसे पहली बार बताया जा रहा था कि उसने तीन साल जो कुछ भी किया वह relaxation था, self-soothing था, entertainment for the tired mind था लेकिन वो ध्यान नहीं था।

यही आज के समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। करोड़ों लोग ध्यान की तकनीक करते हुए सोच रहे हैं कि वे ध्यान कर रहे हैं जबकि एक मिनट भी कोई ध्यान नहीं कर रहा है।

आज हम इसी एक प्रश्न में उतरेंगे कि ध्यान क्या है और इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण कि ध्यान क्या नहीं है?

ध्यान क्या है, ये समझने से पहले हमें वह सब जानना होगा जो ध्यान कह कर हमें ऑनलाइन या ऑफलाइन बेचा या समझाया जा रहा है।

मित्रों, ध्यान एक technique नहीं है जैसे ये करो, वो करो, ऐसे साँस लो, ऐसे बैठो, ये मंत्र बोलो, इत्यादि। ध्यान क्योंकि शरीर से शुरू होता है अतः यह सब ध्यान तक पहुँचने के तरीके या तकनीक हैं लेकिन ध्यान नहीं है | इन सब के माध्यम से ध्यान के दरवाजे तक पहुँचा जा सकता है लेकिन ध्यान का दरवाज़ा स्वयम खुलता है आपके वहाँ पहुँचने से या दरवाज़ा थप-थपाने से नहीं खुलेगा | वहाँ तक पहुँचने में यह सब तकनीक सहायता कर सकती हैं | तकनीक आपको कुछ समय की शान्ति यानि रिलैक्सेशन या उत्साह या ख़ुशी दे सकती हैं क्योंकि यह सब तकनीक शरीर से सम्बन्धित है अतः इनका यह सब देना स्वाभाविक है | लेकिन हमें यही बताया जा रहा है कि यह सब मिलना ही ध्यान की शुरुआत है | जबकि असल में यह वहाँ तक पहुँचने का पहला कदम भर ही है | क्योंकि जब तक कर्ता है यानि मैं है तब तक ध्यान नहीं है |

मित्रो, ध्यान को concentration या एकाग्रता भी कहा जा रहा है।

ये दूसरी ग़लतफ़हमी है। एकाग्रता यानि एक चीज़ पर मन को टिकाना। मोमबत्ती की लौ पर। साँस पर। मंत्र पर। आज के अधिकांश “meditation apps” आपको concentration सिखा रहे हैं और उसे ध्यान कह रहे हैं। लेकिन  concentration तनावपूर्ण है। उसमें कोशिश है। उसमें एक चीज़ चुनना है और बाक़ी को अस्वीकार करना है। यानी द्वंद्व। और जहाँ द्वंद्व है, वहाँ ध्यान नहीं हो सकता।

पतंजलि के योगसूत्र यानि अष्टांग योग में धारणा, ध्यान, समाधि, ये तीन अलग चीज़ें हैं। धारणा यानी concentration। ध्यान उसके आगे है। समाधि उसके भी आगे। यहाँ, यह कहते हुए ऋषि पतंजलि समझाना चाह रहे हैं कि concentration नींव है, गंतव्य नहीं। आज की दुनिया नींव को ही गंतव्य मानकर बैठ गई है।

मित्रो, ध्यान relaxation भी नहीं है। ये तीसरी और सबसे आम ग़लतफ़हमी है। मुझे ध्यान करके आराम मिलता है”, ये वाक्य आज लाखों लोग बोलते हैं। और इस वाक्य में दो ग़लतियाँ हैं। पहली कि ध्यान का उद्देश्य आराम नहीं है। दूसरी कि जिससे आराम मिलता है, वह ध्यान नहीं है क्योंकि आपने सिर्फ एक relaxation technique का इस्तेमाल किया है, जो शरीर को physiologically settle कर देती है। ये एक medical phenomenon है, आध्यात्मिक नहीं। असली ध्यान में आराम नहीं मिलता। असली ध्यान में कुछ मिलता ही नहीं क्योंकि पाने वाला ही गायब हो जाता है।

एक और तरह की तकनीक को ध्यान कहा जाता है और वह है stress-management ये चौथी ग़लतफ़हमी है और सबसे ख़तरनाक। आज corporate world ने ध्यान को “productivity tool” बना दिया है। “5 minutes of mindfulness before meeting”, “Meditate to focus better at work”.

ये ध्यान का अपमान है। ध्यान आपको बेहतर कर्मचारी बनाने के लिए नहीं है। ध्यान आपको कर्मचारी होने के बोध से बाहर निकालने के लिए है। ये दो बिल्कुल विपरीत दिशाएँ हैं।

आपके मन में अब एक प्रश्न अवश्य उठ रहा होगा कि फिर आखिर ध्यान क्या है और क्या बाकि सब गलत और ये व्यक्ति सच ? ऐसा कैसे हो  सकता है ?

दोस्तों, आपको अभी जो भी तकनीक बताई हैं वह सब सच और ठीक हैं | stress management तकनीक बहुत अच्छी है और इससे stress कम होता है, प्रोडक्टिविटी बढ़ती है, इसमें कोई शक नहीं | हम ये भी नहीं कह रहे हैं कि कंसंट्रेशन या साँस सही तरीके से लेने या सही आसन या संगीत या vibration या मंत्र बोलने या अन्य प्रकार की तकनीक या ऑनलाइन या ऑफलाइन कोर्स करवाने वाले जो भी तकनीक सिखा रहे हैं वह गलत सिखा रहे हैं | वह सब अपने हिसाब से जो भी सिखा या बता रहे हैं वह सब ठीक हैं और उन से आपको फायदा मिलेगा, बिलकुल सही और ठीक है | हम किसी को भी गलत ठहराने के लिए आपको नहीं बोल रहे हैं |

हम केवल ये कह रहे हैं वे इन तकनीकों को मैडिटेशन करने की तकनीक कह रहे हैं ये गलत है या ये ही मैडिटेशन है ये गलत है | क्योंकि कभी भी और कोई भी तकनीक मैडिटेशन नहीं हो सकती | जैसा कि हम ने पहले भी कहा है कि ये सब तकनीक मैडिटेशन के दरवाजे तक पहुँचा सकती हैं लेकिन उस से आगे कोई तकनीक काम नहीं करती है |

अगले भाग में जारी रहेगा…….

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