प्रेम कब प्रेम न होकर पिंजरा बन जाता है??

प्रेम में जब असुरक्षा का अनुभव होने लगता है तब प्रेम एक पिंजरा बन कर रह जाता है | आइये इसे विज्ञान भैरव तंत्र, बौद्ध करुणा, तिब्बती साधना और आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से समझते हैं कि ऐसा कब और क्यों  होता है |

रात के ग्यारह बजे हैं। आपका साथी सो चुका है, लेकिन आपकी आँखों से नींद अब भी कोसों दूर है। आप मोबाइल की हल्की रोशनी में उनका आख़िरी मैसेज बार-बार पढ़ रहे हैं। मैसेज में कुछ भी ग़लत नहीं है। बस इतना लिखा है — “ठीक है, बात करते हैं बाद में”। लेकिन आपका मन इन छह शब्दों को किसी जासूस की तरह टटोल रहा है। बाद में क्यों? अभी क्यों नहीं? क्या वे नाराज़ हैं? क्या मैंने कुछ ग़लत कह दिया?

यह किसी दूर रह रहे प्रेमी का प्रसंग हो सकता है, किसी दूर रह रहे जीवनसाथी का या किसी ऐसे साथी का भी जो आपके साथ रहते हुए भी इस समय सो चुका है। यह किसी के साथ भी हो सकता है और लगभग हर तीसरा व्यक्ति कभी न कभी इस अनुभव से गुजरता है। यहाँ केवल प्रसंग महत्वपूर्ण नहीं है; उससे अधिक महत्वपूर्ण है वह सोच और उस सोच में पसरा हुआ डर।

प्रेम, जो हमें सबसे अधिक सुरक्षा देने का वादा करता है | अक्सर हमारी सबसे गहरी असुरक्षा का स्रोत बन जाता है। हम प्रेमी या जीवनसाथी के साथ इसलिए चल रहे थे कि उसका साथ पाकर हमारा अकेलापन दूर हो जाएगा लेकिन कुछ समय बाद हमे ऐसा लगने लगता है कि हम तो अब पहले से भी ज्यादा अकेले हो गए हैं| यह विरोधाभास इतना आम है कि हमने इसे “प्रेम” का स्वाभाविक हिस्सा मान लिया है। हम कहते हैं कि “जहाँ प्रेम है, वहाँ डर तो रहेगा ही”, और हम इस वाक्य को इतनी बार दोहराते हैं कि यह सच लगने लगता है।

लेकिन क्या यह सच है? क्या प्रेम और डर सचमुच साथ-साथ चलते हैं या हमने किसी और ही चीज़ को प्रेम का नाम दे दिया है?

आज हम इसी प्रश्न के भीतर उतरेंगे और इसे किसी एक दृष्टिकोण से न देख, चार अलग-अलग दीयों की रोशनी इस प्रश्न या सोच के अंधेरे कमरे में लाएँगे — आधुनिक मनोविज्ञान का दीया, तंत्र का दीया, बुद्ध और तिब्बती परंपरा का दीया और विज्ञान भैरव तंत्र का दीया। चारों दीये अलग हैं लेकिन इनकी रोशनी एक ही है। और जब यह रोशनी पूरी तरह फैलेगी तो आप पाएँगे कि जिसे आप “प्रेम का डर” समझ रहे थे, वह असल में प्रेम था ही नहीं।

तुलसीदास का “डर” और बाज़ार का “डर”

एक बात पहले स्पष्ट कर लेते हैं कि यहीं सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी छिपी है।

तुलसीदास ने लिखा था — “भय बिनु होइ न प्रीति” यानी भय के बिना प्रीति यानि प्रेम नहीं हो सकता। इस एक पंक्ति को आज के आध्यात्मिक बाज़ार ने इस तरह उठा लिया है मानो यह डर बेचने का लाइसेंस हो। “डरो, तभी प्रेम करोगे”, यह संदेश हर तरफ़ बिक रहा है।

तुलसीदास क्या असल में डर की बात कर रहे थे और यदि कर रहे थे तो क्या यह वही डर था जो आज बाजार में बिक रहा है|

असल में तुलसीदास का डर एक प्रेमी का डर था कि कहीं प्रभु से मेरी दूरी न बढ़ जाए, कहीं मेरी भक्ति में कमी न रह जाए। यह डर सम्मान से उपजा डर था,  असुरक्षा से नहीं। जैसे एक बच्चा अपनी माँ का “डर” मानता है इसलिए नहीं कि माँ उसे छोड़ देगी बल्कि इसलिए कि वह उस रिश्ते की गरिमा को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता। यह डर रिश्ते को पवित्र बनाता है, पिंजरा नहीं।

लेकिन जो डर आधी रात को आपको जगा रहा है, वह तुलसीदास का डर नहीं है। वह खोने का डर है, त्याग दिए जाने का डर है, अकेले रह जाने का डर है। यह डर रिश्ते को पवित्र नहीं बनाता बल्कि उसका गला घोंटता है। तुलसीदास के डर में प्रेम बढ़ता है। इस डर में प्रेम सिकुड़ता है।

तो पहली समझ यही है कि हर डर एक जैसा नहीं होता। और जिस डर की हम आज बात कर रहे हैं, वह, वह डर है जो प्रेम का वेश धारण किए हुए है, पर भीतर से प्रेम का शत्रु है।

पहला दीया — आधुनिक मनोविज्ञान क्या कहता है

आधुनिक मनोविज्ञान के पास इस अनुभव के लिए एक बहुत सटीक शब्द है — Anxious Attachment  यानी चिंताग्रस्त लगाव।

मनोविज्ञान कहता है कि हम जिस तरह बचपन में अपने माता-पिता या प्राथमिक देखभाल करने वालों से जुड़ते हैं, वही ढाँचा बड़े होकर हमारे प्रेम-संबंधों में दोहराया जाता है। जिस बच्चे को यह अनिश्चितता मिली हो कि “माँ कब पास आएगी, कब दूर चली जाएगी, यह तय नहीं”, वह बड़ा होकर एक ऐसा वयस्क बनता है जिसका तंत्रिका-तंत्र निकटता को लेकर हमेशा सतर्क रहता है। उसका मन हर रिश्ते में एक ही प्रश्न दोहराता रहता है कि क्या तुम सच में रहोगे? क्या तुम सच में मेरे हो?

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कोई “कमज़ोरी” या “चरित्र दोष” नहीं है। यह एक सीखी हुई प्रतिक्रिया है। आपकी सोच बचपन में जिस वातावरण में बनी, उसने वहीं से यह निष्कर्ष निकाला कि “प्रेम अस्थिर चीज़ है, इस पर लगातार नज़र रखनी पड़ती है, वरना यह छिन जाएगा।” और अब, वर्षों बाद, आपका मस्तिष्क उसी पुराने नक़्शे से एक नए शहर में रास्ता ढूँढ रहा है।

मनोविज्ञान यह भी बताता है कि छोड़े जाने के डर के पीछे एक और गहरी परत होती है, जिस में भीतर कहीं एक मान्यता बैठी होती है कि “मैं अपने आप में पर्याप्त नहीं हूँ। यदि यह व्यक्ति मुझे छोड़ देगा, तो यह इसलिए होगा क्योंकि मुझमें कोई कमी थी।” इसलिए रिश्ता केवल रिश्ता नहीं रह जाता बल्कि वह आपके अपने मूल्य का प्रमाणपत्र बन जाता है। साथी का हर मैसेज, हर देखने का ढंग, हर चुप्पी, सब आपके अस्तित्व पर एक फ़ैसला बन जाता है।

यहीं से एक दुखद चक्र शुरू होता है, जिसे मनोविज्ञान में ” Protest Behavior ” यानी विरोध-व्यवहार कहते हैं। डर के कारण आप या तो साथी से चिपकने लगते हैं यानि बार-बार आश्वासन माँगते हैं, बार-बार पूछते हैं “तुम मुझसे प्यार करते हो ना?”  या फिर डर के कारण आप साथी को सज़ा देने लगते हैं यानि रूठते हैं, दूर हो जाते हैं ताकि वह आपको मनाएँ और आपका डर थोड़ी देर के लिए शांत हो जाए। दोनों ही व्यवहार साथी को थका देते हैं। और जितना साथी थकता है, उतना ही वह दूरी बनाता है। और जितनी दूरी बनती है, उतना ही आपका डर बढ़ता है। यह एक ऐसा चक्र है जो अपने आप को खाता रहता है।

मनोविज्ञान की यह दृष्टि बहुमूल्य है, क्योंकि यह आपको अपराध-बोध से मुक्त करती है। यह कहती है कि “तुम बुरे नहीं हो, तुम टूटे हुए नहीं हो। तुमने बस कुछ सीखा था और जो सीखा था उसे फिर से भी सीखा जा सकता है।” लेकिन मनोविज्ञान यहीं रुक जाता है। वह आपको चक्र दिखा देता है, उसका कारण बता देता है, पर वह एक प्रश्न का उत्तर नहीं देता कि यह “मैं” कौन है जो छोड़े जाने से इतना डरता है? जिसे बचाने के लिए यह सारा संघर्ष चल रहा है, वह आख़िर है क्या?

इस प्रश्न के उत्तर के लिए हम दूसरा दीया तंत्र का जलाते हैं।

आगे बढ़ने से पहले एक बात कि मनोविज्ञान ने हमें एक महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि दी और वह है भविष्यवाणी करने वाले मस्तिष्क की धारणा। आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान कहता है कि हमारा मस्तिष्क मूलतः एक भविष्यवाणी मशीन है। वह वर्तमान को सीधे अनुभव नहीं करता बल्कि वह पिछले अनुभवों के आधार पर लगातार यह अनुमान लगाता रहता है कि अगले क्षण क्या होगा। यदि बचपन में बार-बार यह अनुभव हुआ कि “जो प्रिय है, वह छिन जाता है”, तो मस्तिष्क ने इसे एक नियम की तरह दर्ज कर लिया। और अब, हर रिश्ते में, वह उसी नियम के आधार पर भविष्यवाणी करता है, “यह भी छिन जाएगा।”

इसका अर्थ यह है कि जब आप साथी के एक ठंडे मैसेज को देखकर घबरा जाते हैं, तो आप उस मैसेज पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहे होते। आप अपने मस्तिष्क की भविष्यवाणी पर प्रतिक्रिया दे रहे होते हैं। मैसेज तो बस एक चिंगारी है और आग का सारा ईंधन भीतर पहले से जमा है। यही कारण है कि एक ही घटना दो अलग-अलग लोगों में बिलकुल अलग प्रतिक्रिया जगाती है। घटना समान है, पर भीतर का ईंधन अलग है। और यह समझ बहुत मुक्तिदायक है क्योंकि यदि समस्या बाहर की घटना में होती, तो हम असहाय होते। पर समस्या भीतर के ईंधन में है, और ईंधन को हम देख सकते हैं, समझ सकते हैं, और धीरे-धीरे बदल सकते हैं।

मनोविज्ञान यह भी स्पष्ट करता है कि यह डर अक्सर आत्म-पूर्ति करने वाली भविष्यवाणी बन जाता है। यानी जिस चीज़ से हम सबसे अधिक डरते हैं, हमारा डर ही उसे सच कर देता है। आप डरते हैं कि साथी दूर चला जाएगा और इस डर के कारण आप इतना चिपकते हैं, इतना आश्वासन माँगते हैं, इतनी जाँच-पड़ताल करते हैं कि साथी सचमुच घुटन महसूस करने लगता है और दूरी बनाने लगता है। फिर आप कहते हैं कि “देखा, मैं सही था, वे दूर जा रहे थे।” पर सच यह है कि आपका डर भविष्यवक्ता नहीं था, वह वास्तुकार था। उसने वही बनाया जिससे वह डरता था। यह चक्र तभी टूटता है जब कोई इसे भीतर से देख ले और देखना ही पहला कदम है।

तंत्र इस पूरे प्रश्न को एक बिलकुल अलग कोण से देखता है। तंत्र पूछता है कि डर “बुरा” है या नहीं, यह बहस छोड़ो। पहले यह देखो कि डर है क्या।

तंत्र की दृष्टि में डर एक ऊर्जा है। और ऊर्जा कभी अच्छी या बुरी नहीं होती| वह बस ऊर्जा होती है। जिस तरह बिजली एक ऊर्जा है, जो बल्ब भी जला सकती है और घर भी। बिजली को “बुरा” कहना मूर्खता होगी। यहाँ प्रश्न बिजली का नहीं बल्कि उसके बहाव का है।

अधिकांश परंपराएँ डर के साथ युद्ध करना सिखाती हैं जैसे “डर पर विजय पाओ”, “डर को हराओ”, “निडर बनो”। तंत्र यहाँ एकदम उल्टा खड़ा है। तंत्र कहता है कि जिस चीज़ से तुम लड़ोगे, वह और मज़बूत होगी क्योंकि लड़ने के लिए तुम्हें उस पर ध्यान देना पड़ता है और ध्यान ही ऊर्जा का भोजन है। तंत्र कहता है कि डर से लड़ो मत, डर के साथ बैठो” उसे देखो। उसे महसूस करो। उसके भीतर उतरो।

जब छोड़े जाने का डर उठता है, तो अधिकांश लोग तुरंत कुछ “करने” लगते हैं जैसे मैसेज करते हैं, फ़ोन करते हैं, आश्वासन माँगते हैं या मन ही मन कहानियाँ बुनते हैं। यह सब डर से भागना है। तंत्र कहता है कि एक बार भागो मत। एक बार रुको। उस डर को अपने शरीर में महसूस करो कि वह कहाँ है, छाती में, पेट में, गले में, उसका रंग क्या है, उसका आकार क्या है? डर को एक विचार की तरह मत देखो, उसे एक सीधे अनुभव की तरह देखो।

आपके ऐसा करते ही एक चमत्कार होगा। जिस डर से अभी तक आप भाग रहे थे, उससे लड़ रहे थे, आपके रुकते ही यानि महसूस करते ही वह बदलने लगता है। तंत्र का मूल सूत्र भी यही है कि जो पूरी तरह महसूस कर लिया जाता है, वह रूपांतरित हो जाता है। डर जो आपको कमज़ोर कर रहा था, यदि उसे पूरी जागरूकता से देखा जाए, तो वही ऊर्जा एक प्रकार की जागृति में बदल जाती है।

तंत्र एक और गहरी बात कहता है, जो प्रेम-संबंधों के लिए विशेष रूप से मूल्यवान है। तंत्र कहता है कि आपके सामने जो व्यक्ति है, वह केवल एक व्यक्ति नहीं है, वह एक दर्पण है। जिस साथी से आप यह आश्वासन माँग रहे हैं कि “मुझे छोड़कर मत जाना”, वह साथी असल में आपके भीतर की किसी अनदेखी जगह को प्रतिबिंबित कर रहा है। “वे मुझे छोड़ देंगे” यह डर असल में बाहर से नहीं आ रहा। यह डर आपके भीतर से आ रहा है और वह भी उस जगह से जहाँ आपने स्वयं को बहुत पहले छोड़ दिया था।

इस बात को ठहरकर समझिए, क्योंकि यह तंत्र की सबसे क्रांतिकारी अंतर्दृष्टि है। आप साथी के छोड़ जाने से नहीं डरते। आप उस खालीपन से डरते हैं जो साथी के जाने के बाद सामने आ आएगा। साथी तो बस उस खालीपन को ढाँकने वाला पर्दा है। और जब तक खालीपन ढका है, तब तक डर रहेगा क्योंकि कभी भी पर्दा हट सकता है। तंत्र कहता है कि पर्दे को पकड़कर मत रखो। पर्दे के पीछे जो है, उसका सामना करो। क्योंकि जिस खालीपन से आप इतना डरते हैं, वह असल में खाली नहीं है। लेकिन यह तीसरे और चौथे दीये की बात है।

तंत्र की एक और शिक्षा यहाँ जोड़ने योग्य है। तंत्र कहता है कि प्रत्येक भावना के दो रूप होते हैं, एक उसका बहिर्मुख रूप, और एक उसका अंतर्मुख रूप। बहिर्मुख रूप में डर एक पीड़ा है और वह आपको बेचैन करता है, आपकी नींद छीनता है, आपको ऐसे काम करने पर मजबूर करता है जो आप नहीं करना चाहते। पर वही डर, जब अंतर्मुख होता है यानी जब उसकी ऊर्जा बाहर की ओर बहने के बजाय भीतर की ओर मुड़ती है तो वह एक तीव्र सजगता बन जाता है, एक प्रकार की जागृति जो साधना में बहुत मूल्यवान है। तंत्र, साधक को डर का दमन नहीं सिखाता, उसका रूपांतरण सिखाता है। और रूपांतरण की कुंजी एक ही है और वह है उर्जा की दिशा बदलना। वही ऊर्जा, बस उसका मुँह बाहर से भीतर की ओर मोड़ देना।

यही कारण है कि तंत्र को अक्सर ग़लत समझा जाता है। लोग सोचते हैं तंत्र भोग का मार्ग है या किसी गुप्त शक्ति का मार्ग है। पर तंत्र का असली अर्थ है, विस्तार। वह तकनीक जो चेतना को फैलाती है। तंत्र किसी भी अनुभव को यानि सुख हो या दुख, प्रेम हो या भय, चेतना के विस्तार का द्वार बना देता है। छोड़े जाने का डर भी, तंत्र की दृष्टि में, एक बंद दरवाज़ा नहीं, एक द्वार है। बस उसे खोलने का ढंग आना चाहिए।

भाग 2 में जारी रहेगा……….

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