Zen ध्यान क्या है?

Zen — बस बैठना काफी है? वह सवाल जिसका जवाब बैठकर ही मिलता है

भूमिका

दुनिया में शायद ही कोई ऐसी आध्यात्मिक परंपरा हो जो इतने कम शब्दों में इतनी गहरी बात कह दे — जितनी Zen कहती है। Zen के एक गुरु से किसी ने पूछा, “ध्यान क्या है”? गुरु ने कहा, “जब भूख लगे तो खाओ। जब थकान हो तो सो जाओ”। शिष्य हैरान हो गया। बोला, “लेकिन यही तो सब करते हैं”।

गुरु मुस्कुराए और बोले, “नहीं। तुम खाते हुए हज़ारों बातें सोचते हो। खाने पर ध्यान कहाँ होता है तुम्हारा? और जब सोते हो तो हज़ारों चिंताएँ लेकर सोते हो, जो सपने बनकर चैन नहीं लेने देतीं। जब खाओ तो केवल खाओ। जब सोओ तो केवल सोओ। बस यही और इतना-सा Zen है”।

यह एक छोटी-सी बात है। लेकिन इसमें Zen की पूरी समझ है। “बस बैठो”, यह सुनने में बड़ा आसान लगता है। लेकिन जो कोई भी इसे सच में आज़माता है तो वह जान जाता है कि बस बैठना जीवन का सबसे मुश्किल काम है।

यह लेख Zen को समझने की एक ईमानदार कोशिश है। न उसे बड़ा-चढ़ाकर दिखाने की, न उसे इतना सरल बनाने की कि वह उथला हो जाए। Zen जैसा है — वैसा।

Zen आया कहाँ से?

बहुत कम लोग जानते हैं कि Zen की शुरुआत भारत में हुई थी।

बौद्ध परंपरा में एक मशहूर घटना है जिसे “पुष्प प्रवचन” कहते हैं। एक दिन शिष्य, बुद्ध से उपदेश सुनने के लिए बैठे थे। लेकिन उस दिन बुद्ध ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने पास में रखा एक कमल का फूल उठाया और चुपचाप उसे देखने लगे। सभी शिष्य हैरान थे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी कि कुछ पूछे। वहीँ बैठा एक शिष्य, “महाकाश्यप”, यह देख मुस्कुरा रहा था।

बुद्ध ने कहा, “जो शब्दों में कहा जा सकता था | वह मैंने कह दिया। जो नहीं कहा जा सकता था | वह मैंने महाकाश्यप को दे दिया”।

यही वह बात है जो आगे चली यानि शब्दों से परे, सीधे अनुभव से अनुभव तक।

यह धारा भारत से श्रीलंका, फिर मध्य एशिया होते हुए चीन पहुँची। जब बोधिधर्म नाम के एक भारतीय भिक्षु चीन गए तो उन्होंने यह सोच आगे बढ़ाई और इसीलिए उन्हें ही Zen का जनक माना जाता है। चीनी में इस परंपरा को “Ch’an” कहा जाता है जोकि संस्कृत के “ध्यान” शब्द का चीनी रूप है। जब यह जापान पहुँची तो “Ch’an” बना “Zen”।

तो Zen असल में भारतीय ध्यान परंपरा का एक विकसित रूप है, जो चीन और जापान की संस्कृतियों से गुज़रकर एक बिल्कुल अलग रूप में सामने आया।

Zen की असली समझ

Zen को समझने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि वह क्या नहीं है।

Zen कोई धर्म नहीं है। इसमें कोई भगवान नहीं, जिसकी पूजा करनी हो। कोई किताब नहीं जिसे रटना हो। कोई मान्यता नहीं, जिसे स्वीकार करना हो। Zen के गुरु अक्सर कहते हैं — “रास्ते में बुद्ध मिल जाएँ तो उन्हें भी मार दो”। इसका मतलब बुद्ध का अपमान नहीं है। इसका मतलब है कि किसी भी विचार से, किसी भी सत्ता से, किसी भी धारणा से चिपके मत रहो क्योंकि वह भी एक तरह की जंजीर है।

Zen की असली बात यह है कि हर इंसान में बुद्ध-स्वभाव पहले से मौजूद है। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं जो बाहर से मिलेगी। यह कोई उपलब्धि नहीं जो मेहनत से हासिल होगी। यह पहले से और हमेशा से है।

समस्या यह नहीं कि बुद्ध-स्वभाव नहीं है। समस्या यह है कि हम उसे पहचान नहीं पाते। हम विचारों की इतनी घनी परत बना लेते हैं कि उसके नीचे जो है, वह दिखता ही नहीं। Zen इस परत को हटाने का काम करता है। लेकिन हटाने का तरीका भी अनोखा है। यह कोई विधि नहीं देता। कोई अभ्यास नहीं देता। बस कहता है — बैठो। और देखो कि क्या हो रहा है।

ज़ाज़ेन — वह बैठना जो बैठना नहीं है

Zen की मुख्य साधना है ज़ाज़ेन यानी “बैठकर ध्यान”। लेकिन ज़ाज़ेन को “ध्यान” कहना भी शायद ठीक नहीं। क्योंकि ध्यान में आमतौर पर कोई लक्ष्य होता है जैसे शांति पाना, एकाग्र होना, कुछ चाहना। ज़ाज़ेन में कोई लक्ष्य नहीं है।

Zen के गुरु डोगेन या डोजेन, जिन्होंने जापान में Soto Zen की नींव रखी थी | उन्होंने इसे एक शब्द में कहा था: “शिकांताज़ा” यानी “बस बैठना”| यह “बस” बहुत ज़रूरी है। ज़ाज़ेन में आप बैठते हैं, पीठ सीधी, आँखें आधी खुली, हाथ एक विशेष मुद्रा में। और फिर? कुछ नहीं। बस बैठना है। कोई मंत्र नहीं। कोई कल्पना नहीं। कोई साँस की कोई विधि नहीं। कोई एकाग्रता का विषय नहीं। बस — बैठना।

पहली बार सुनने में यह बड़ा आसान लगता है। लेकिन जो कोई पाँच मिनट ज़ाज़ेन आज़माता है, वह समझ जाता है कि यह कितना मुश्किल है। मन तुरंत कहीं चला जाता है। कोई विचार आता है, कोई योजना बनने लगती है, कोई याद आती है, कोई कल्पना शुरू होती है। पाँच मिनट में मन हज़ार जगह घूम आता है। ज़ाज़ेन में यही देखना है।

मन का यह भटकना कोई समस्या नहीं है। समस्या यह है कि हम इस भटकने के साथ इतने घुल-मिल जाते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि भटकाव हो रहा है। ज़ाज़ेन में जब विचार आए तो देखो। वापस आओ। बस इतना। वापस कहाँ? बस, यहाँ। इस पल में। इस साँस में। इस बैठने में।

यह अभ्यास जितना सरल है, उतना ही गहरा है। क्योंकि यह एक बहुत बुनियादी बात सामने लाता है कि हम कभी “यहाँ” नहीं होते। हमेशा कहीं और होते हैं। ज़ाज़ेन कहता है कि बस यहाँ रहो। बस इतना।

वह सवाल जिसका जवाब नहीं

ज़ाज़ेन के साथ Zen की दूसरी बड़ी साधना है — कोआन। कोआन एक ऐसा सवाल या बात है जिसका कोई तार्किक जवाब नहीं है। यह मन को वहाँ ले जाता है जहाँ तर्क काम नहीं करता। और जब तर्क का काम बंद हो जाता है तब ही कुछ और खुलता है।

सबसे मशहूर कोआन है, “एक हाथ से बजाने पर क्या आवाज़ आती है”? या “जन्म से पहले तुम्हारा असली चेहरा कैसा था”? या “अगर सब कुछ एक है तो वह एक भी क्या है”? इन सवालों का कोई सोचकर जवाब नहीं दिया जा सकता। अगर आप सोचकर जवाब देने की कोशिश करेंगे तो गुरु तुरंत मना कर देगा। क्योंकि कोआन का मकसद सोच को चुनौती देना नहीं बल्कि  सोच को ही थका देना है।

जब मन इतना कोशिश करता है, इतना सोचता है, इतनी मेहनत करता है और फिर भी कोई जवाब नहीं मिलता तब एक पल ऐसा आता है जब सोच बंद हो जाती है और उस चुप्पी में कभी-कभी कुछ और होता है। इसे ही Zen में “सातोरी” कहते हैं। एक अचानक झलक। एक पहचान का पल। यह कोई टिकी हुई अवस्था नहीं है। एक पल है लेकिन वह पल बहुत कुछ बदल देता है। Rinzai Zen में कोआन साधना मुख्य है। Soto Zen में ज़ाज़ेन मुख्य है। दोनों की मंज़िल एक है — रास्ता अलग है।

Zen और शब्दों का विरोध

Zen की एक बड़ी खासियत यह है कि वह शब्दों पर बहुत कम भरोसा करता है और यह अजीब लगता है क्योंकि Zen के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन Zen के गुरु हमेशा कहते रहे हैं कि जो लिखा गया है वह नक्शा है, ज़मीन नहीं। चाँद की तरफ इशारा करने वाली उँगली है, चाँद नहीं। Zen में सीधे देने पर ज़ोर है। गुरु से शिष्य तक। शब्दों से नहीं बल्कि  उपस्थिति से। इसे “मन से मन को देना” कहते हैं।

इसीलिए Zen में अजीब-अजीब लगने वाली घटनाएँ होती हैं। एक गुरु ने शिष्य को लाठी से मारा। एक ने अचानक ज़ोर से चिल्लाया। एक ने शिष्य का हाथ मरोड़ दिया। यह इसलिए नहीं कि वे क्रूर थे। यह इसलिए था कि सोच को एक झटके में रोका जाए। उस अचानक के पल में शायद कुछ और दिख जाए।

Zen और आज का ज़माना

आज Zen बहुत मशहूर है जैसे “Zen जीवनशैली”, “Zen गृहसज्जा”, “Zen उत्पादकता” आदि बातें या सोच या कार्य पद्धति हर जगह फैली हुई है लेकिन मशहूर Zen और असली Zen में बड़ा फर्क है। आम समझ में Zen का मतलब है, सादगी, शांति, कम सामान। यह बुरा नहीं है। लेकिन यह Zen की ऊपरी परत है, गहराई नहीं।

असली Zen बड़ी माँग करता है। एक पारंपरिक Zen आश्रम में साधक सुबह तीन-चार बजे उठते हैं। घंटों ज़ाज़ेन करते हैं। काम करते हैं। फिर ज़ाज़ेन। फिर काम। यह एक पूरी जीवनशैली है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि Zen केवल आश्रमों के लिए है। Zen का असली मतलब या बात या सोच है कि जो है वह यहाँ है, अभी है जोकि किसी भी साधारण जीवन में उतारी जा सकती है। जब खाना खाएँ तो केवल खाएँ। जब चलें तो केवल चलें। जब किसी से बात करें तो केवल उससे बात करें। यह Zen है जिसके लिए कोई आश्रम नहीं चाहिए। लेकिन यह जितना आसान लगता है उतना है नहीं। क्योंकि हमारा मन इतना आदी हो चुका है कि “केवल यह” करना उसके लिए लगभग नामुमकिन है।

Zen और भारतीय ध्यान — क्या फर्क है?

भारतीय ध्यान परंपरा में खासकर पतञ्जलि में एक साफ ढाँचा है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। एक के बाद एक कदम। Zen में कोई कदम नहीं है। कोई नक्शा नहीं है। बस बैठो। यह नज़रिए का फर्क है।

भारतीय परंपरा कहती है कि तैयारी करो, फिर छलाँग लगाओ। Zen कहता है कि तैयारी की कोई ज़रूरत नहीं। सीधे छलाँग लगाओ। अभी। दोनों में से कोई गलत नहीं है। दोनों अलग-अलग तरह के साधकों के लिए हैं।

जिसे क्रमबद्ध तरीका चाहिए, जिसे ढाँचा चाहिए, जिसे कदम-दर-कदम स्पष्टता चाहिए, उसके लिए भारतीय परंपरा ज़्यादा सही है। जो सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार है, उसे किसी नक्शे की ज़रूरत नहीं है | जो सीधे कूदना चाहता है, उसके लिए Zen। लेकिन एक बात दोनों में साझा है और वह है अनुभव। दोनों आखिरकार किसी मान्यता को नहीं बल्कि सीधे अनुभव को अहमियत देते हैं।

क्या बस बैठना काफी है?

डोगेन का जवाब था “हाँ”। ज़ाज़ेन ही जागरण है। बैठना और जागना, ये दो अलग बात नहीं हैं। यह बड़ी गहरी बात है। इसका मतलब यह है कि जागरण कोई आने वाला लक्ष्य नहीं है जो बैठने के बाद मिलेगा। बैठना ही अगर वह सच में “बस बैठना” हो, जागरण का ही रूप है। लेकिन यहाँ एक उलझन है।

अगर आप यह सोचकर बैठें कि “बैठने से जागरण मिलेगा” तो वह ज़ाज़ेन नहीं है। क्योंकि उसमें लक्ष्य है। और लक्ष्य के साथ “बस बैठना” हो नहीं सकता। ज़ाज़ेन तब होता है जब बैठना बिना किसी उम्मीद के हो। बिना किसी लक्ष्य के। बिना किसी पाने की चाह के। और यही सबसे मुश्किल है। क्योंकि हम हर काम किसी न किसी मतलब के लिए करते हैं। “बिना मतलब के बैठना”, यह मन की बुनियादी आदत के खिलाफ है। इसीलिए Zen कहता है कि बस बैठो। लेकिन वह “बस” पूरी आदत को चुनौती देता है।

तो जवाब है — हाँ, बस बैठना काफी है। लेकिन वह “बस बैठना” जितना आसान लगता है उतना नहीं है। और जिस दिन वह सच में “बस बैठना” हो जाता है, उस दिन शायद यह सवाल ही नहीं रहता कि काफी है या नहीं।

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