Close-up of a decorative Om symbol on a hanging ornament, perfect for spiritual and meditative themes.

ॐ – एक अक्षर जो बोला नहीं, सुना जाता है

यह किसी धर्म का चिह्न नहीं है। यह सृष्टि की वह आवाज़ है जो तब भी थी जब कोई सुनने वाला नहीं था।

संसार के लगभग हर कोने में — चाहे वह किसी भी संस्कृति का हो, किसी भी परंपरा का — एक विचित्र समानता मिलती है। ईसाई परंपरा में “Amen” है। यहूदी परंपरा में “Shalॐ” है। इस्लाम में “Ameen” है। तिब्बती बौद्ध धर्म में “ॐ Mani Padme Hum” है। हिंदू परंपरा में “ॐ” है।

यह सब अलग-अलग भाषा और परम्परा में अलग-अलग ध्वनियाँ हैं लेकिन इन में फिर भी एक समानता है कि ये सब उस अनुभव को व्यक्त करने का प्रयास हैं जो शब्दों से परे है। और इन सबमें सबसे प्राचीन, सबसे गहरी, और सबसे वैज्ञानिक रूप से विचारी गई ध्वनि है, “ॐ” है। लेकिन आज ॐ एक धार्मिक चिह्न बनकर रह गया है। योगा कक्षाओं में, मंदिरों में, टी-शर्टों पर हर जगह यह “ॐ” शब्द लिखा मिल तो जाएगा लेकिन लिखने या पढ़ने या देखने वाले को इसकी अहमीयत नहीं पता| इसीलिए शायद इसकी गहराई कहीं खो गई है।

यह लेख ॐ शब्द को उसकी असली गहराई में समझने का प्रयास है। न धार्मिक आस्था के रूप में, न केवल योगाभ्यास के रूप में — बल्कि उस मूल ध्वनि के रूप में जो सृष्टि के आरंभ से है और अंत तक रहेगी।

 ॐ का व्याकरण

“ॐ”  जिसे “AUM” भी लिखा जाता है, वास्तव में तीन ध्वनियों का संयोजन है।

— यह ध्वनि कंठ के सबसे पीछे से उत्पन्न होती है। यह वह ध्वनि है जो बिना जीभ या होठों को हिलाए निकल सकती है। मुँह खोलो और बोलो — जो ध्वनि निकलेगी वह “अ” ही होगी। इसीलिए संस्कृत में “अ” को समस्त ध्वनियों का जनक कहा गया है।

मांडूक्य उपनिषद में “अ” को जागृत अवस्था का प्रतीक माना गया है — वह चेतना जो बाहरी जगत से जुड़ी है।

— यह ध्वनि मुँह के मध्य में बनती है। “अ” से “उ” की यात्रा आरंभ से मध्य की यात्रा है।

मांडूक्य उपनिषद में “उ” को स्वप्न अवस्था का प्रतीक माना गया है — वह चेतना जो भीतरी जगत में विचरती है।

— यह ध्वनि होठों के बंद होने से बनती है। यह वह क्षण है जब बाहरी ध्वनि बंद होती है और केवल भीतरी अनुगूँज शेष रहती है।

मांडूक्य उपनिषद में “म” को गहरी निद्रा की अवस्था का प्रतीक माना गया है — वह चेतना जो न बाहर है, न भीतर, बल्कि अपने मूल में है।

इन तीनों के बाद — एक चौथी अवस्था है। वह मौन जो “म” के बंद होने के बाद आता है। उपनिषद इसे “तुरीय” कहते हैं — चौथी अवस्था। न जागृति, न स्वप्न, न गहरी निद्रा। इन तीनों का साक्षी। शुद्ध चेतना।

इसीलिए “ॐ” केवल एक ध्वनि नहीं है। यह समस्त चेतना की अवस्थाओं का मानचित्र है।

ॐ और विज्ञान

यहाँ एक बात जो विज्ञान की दृष्टि से बहुत रोचक है।

आधुनिक भौतिकी कहती है कि इस सृष्टि में जो कुछ भी है, वह मूलतः ऊर्जा है और ऊर्जा कंपन करती है। हर वस्तु, हर कण, हर परमाणु : एक विशेष आवृत्ति पर कंपन करता है। इस दृष्टि से देखें तो यह सृष्टि मूलतः ध्वनि है, एक विशाल, अदृश्य, अनंत नाद। भारतीय दर्शन ने इसे हज़ारों वर्ष पहले कहा था। “नाद ब्रह्म”, ब्रह्माण्ड ध्वनि है। और उस ध्वनि का मूल स्वरूप : ॐ है।

वैज्ञानिकों ने जब ॐ की ध्वनि को ध्वनि-दृश्य यंत्र से देखा अर्थात जब ध्वनि को दृश्य रूप में परिवर्तित किया गया  तो जो आकृति बनी वह ॐ के संस्कृत चिह्न से आश्चर्यजनक रूप से मिलती-जुलती थी। ॐ की ध्वनि ४३२ हर्ट्ज़ की आवृत्ति के निकट होती है। यह वही आवृत्ति है जिसे कुछ संगीतशास्त्री “प्रकृति की आवृत्ति” कहते हैं।

जब कोई ॐ का उच्चारण करता है तो उसके मस्तिष्क में क्या होता है| इस पर भी शोध हुआ है। एक अध्ययन में पाया गया कि ॐ के उच्चारण से मस्तिष्क की वह तंत्रिका सक्रिय हो जाती है जो योनि तंत्रिका कहलाती है। यह तंत्रिका शरीर के शांत होने की प्रक्रिया से जुड़ी है। इसीलिए ॐ के उच्चारण के बाद जो शांति अनुभव होती है, वह केवल मनोवैज्ञानिक नहीं, भौतिक भी है।

उपनिषदों में ॐ

भारतीय दर्शन के सबसे गहरे ग्रंथों में से एक मांडूक्य उपनिषद, पूरी तरह ॐ को समर्पित है। यह उपनिषद केवल बारह श्लोकों का है। लेकिन इन बारह श्लोकों में जो कहा गया है — उसे पूरी तरह समझने में जीवन लग सकता है।

मांडूक्य उपनिषद का पहला श्लोक कहता है —

“ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोंकार एव।”

अर्थात “ॐ” यह एक अक्षर है लेकिन यही सब कुछ है। जो कुछ अतीत में था, जो वर्तमान में है और जो भविष्य में होगा, वह सब “ॐ” ही है। यह कथन पहली बार पढ़ने में अतिशयोक्ति लग सकता है। लेकिन इसे उस संदर्भ में समझना होगा जिसमें यह कहा गया।

उपनिषद यह नहीं कह रहा कि “ॐ” एक ध्वनि है जिसे बोला जाए। उपनिषद कह रहा है कि “ॐ”वह मूल सत्य है जिससे यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह सब वापस चला जाएगा यानि यहाँ उस उस अनंत चेतना की ओर इंगित किया जा रहा है जो इस सृष्टि का आधार है।

छांदोग्य उपनिषद में भी कहा गया है कि “ॐ”वह सेतु है, जो मृत्यु और अमरत्व के बीच है। वह जो इस ॐ को जान लेता है, वह उस भय से मुक्त हो जाता है।

ॐ और नाद योग

भारतीय परंपरा में ध्वनि को दो प्रकारों में विभाजित किया गया है।

आहत नाद — वह ध्वनि जो किसी वस्तु के आघात से उत्पन्न होती है। जैसे तालियाँ बजाने से, ढोल बजाने से, बोलने से। यह ध्वनि सुनाई देती है और समाप्त हो जाती है।

अनाहत नाद — वह ध्वनि जो बिना किसी आघात के उत्पन्न होती है और सदा से है। जो इस सृष्टि का मूल स्वर है। यह ध्वनि बाहरी कानों से नहीं सुनी जाती | यह भीतर से अनुभव होती है।

नाद योग की साधना में साधक धीरे-धीरे बाहरी ध्वनियों से ध्यान हटाकर भीतरी ध्वनि की ओर जाता है और एक गहरी अवस्था में वह अनाहत नाद को सुनता है | जिसे कुछ लोगों ने एक सूक्ष्म भनभनाहट के रूप में, कुछ ने शंख की ध्वनि के रूप में, कुछ ने एक अनंत “म्म्म” के रूप में वर्णित किया है।

ॐ का “म” वह सेतु है जो आहत नाद से अनाहत नाद की ओर ले जाता है। ॐ बोलते समय जब “म” बंद हो जाता है तब उस मौन में जो अनुगूँज शेष रह जाती है, वही अनाहत नाद की एक झलक है।

ॐ का उच्चारण — क्या, कैसे, क्यों

आज अधिकांश लोग ॐ को “ओम” बोलते हैं। यह पूरी तरह गलत नहीं है। लेकिन पारंपरिक उच्चारण “अ-उ-म” है | तीन अलग ध्वनियाँ जो एक प्रवाह में मिलती हैं।

उच्चारण की विधि इस प्रकार है — गहरी साँस लें। साँस छोड़ते हुए पहले “अ” निकालें — पेट से, खुले मुँह से। फिर “उ” में परिवर्तित होने दें — ध्वनि धीरे-धीरे ऊपर उठती है। फिर “म” पर आएँ — होठ बंद हों, ध्वनि खोपड़ी में गूँजे। और अंत में — मौन। उस मौन में रहें जितनी देर हो सके।

यह केवल उच्चारण नहीं है। यह एक यात्रा है — पेट से कंठ तक, कंठ से मस्तिष्क तक, मस्तिष्क से मौन तक।

और यह मौन ही ॐ का असली अनुभव है। इसीलिए कहा जाता है कि ॐ को बोला नहीं जाता — सुना जाता है।

ॐ और ध्यान

ॐ का उपयोग ध्यान में कई प्रकार से होता है।

मौखिक जप — ॐ को बोलकर दोहराना। यह सबसे स्थूल स्तर है। लेकिन इसका भी महत्व है क्योंकि ॐ की ध्वनि शरीर को, तंत्रिका तंत्र को, और मन को एक विशेष अवस्था में लाती है।

मानसिक जप — ॐ को भीतर ही भीतर दोहराना। यह अधिक सूक्ष्म है। विचारों की गति धीमी होती है और ॐ की ध्वनि एक anchor बन जाती है।

भाव जप — ॐ की ध्वनि नहीं, ॐ का भाव : वह विशालता, वह अनंतता, वह मौन। यह सबसे सूक्ष्म और सबसे गहरा स्तर है।

और अंततः — अजपा जप — वह अवस्था जब जप बिना प्रयास के होने लगता है। जब प्रत्येक साँस के साथ भीतर आते हुए “स” और बाहर जाते हुए “ह”, जो “सोऽहम्” बनता है | वह ॐ का ही एक और रूप है।

ॐ और आधुनिक जीवन

आज ॐ का उपयोग इतना व्यापक हो गया है कि इसका अर्थ धुंधला हो गया है। योगा कक्षाओं में ॐ बोला जाता है अक्सर बिना यह जाने कि क्यों। गहने और कपड़ों पर ॐ का चिह्न है, सजावट के रूप में। विज्ञापनों में ॐ है, ब्रांडिंग के रूप में।

यह सब ॐ का सम्मान नहीं है।

ॐ को उसकी गहराई में समझने के लिए न किसी मंदिर की ज़रूरत है, न किसी विशेष अनुष्ठान की। केवल एक शांत स्थान, थोड़ा समय, और एक ईमानदार जिज्ञासा।

एक सप्ताह तक — प्रतिदिन ५ मिनट — ॐ का उच्चारण करें। “अ-उ-म” — और फिर मौन। देखें कि क्या होता है। न कुछ मान लें, न कुछ नकारें। केवल अनुभव करें। यही ॐ को समझने का एकमात्र मार्ग है।

ॐ एक निमंत्रण

ॐ न हिंदू है, न बौद्ध है, न जैन है।

ॐ वह ध्वनि है जो किसी के आने से पहले थी और किसी के जाने के बाद भी रहेगी।

ॐ वह प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर खोजना है। ॐ वह द्वार है जिसमें प्रवेश करना है। और द्वार में प्रवेश केवल एक ही तरीके से होता है — बैठकर, आँखें बंद करके, गहरी साँस लेकर, और उस एक अक्षर को “अ-उ-म” इतनी गहराई से बोलना जब तक कि बोलने वाला और ध्वनि एक न हो जाएँ।

उस एकता में जो शेष रहे वही ॐ है।

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